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Wednesday, November 7, 2012

बागीचा मेरे सपनो का..


गहरी नींद की चादर ओढ़े सो रहे थे हम..
दूर से कहीं आवाज सुनाई दी भेड़ों की मद्धम मद्धम...

और फिर से हम छोटे से नन्हे से थें..
और वो छोटी लड़कियां फिर से खेल रहीं थी गुड्डा गुडी..
और हम अपने सपनो के बगीचे को देखकर, कुछ हैरान से थें

खेलना सुबह में और रातों को कहानियां...
हमें आज भी याद हैं पतंगों की लड़ाईयां..
हम सायद बहोत खुस थे अपने सपनो के बगीचे को देखकर,,

दिन का आसमानी रंग और रात चांदनी जैसा..
हम नहीं चाहते थे जल्दी उठाना क्यूंकि..
हम इस प्यारे से सपनो के बगीचे में ही खो जाना चाहते थें..